CBI या जज जांच की मांग, हरियाणा में भरोसे का संकट गहराया
आईपीएस वाई पूरन कुमार व एएसआई संदीप लाठर सुसाइड प्रकरण
CBI या जज जांच की मांग, हरियाणा में भरोसे का संकट गहराया
- आईपीएस वाई पूरन कुमार व एएसआई संदीप लाठर सुसाइड प्रकरण
टीएचटी न्यूज, रोहतक।
हरियाणा में नौकरशाही और पुलिस सिस्टम के भीतर उठ रहे सवाल अब राजनीतिक तूल पकड़ चुके हैं। आईपीएस वाई पूरन कुमार की आत्महत्या और एएसआई संदीप लाठर के सुसाइड के बाद प्रदेश भर में CBI या हाईकोर्ट के सीटिंग जज की निगरानी में जांच की मांग तेज हो गई है। जनता, विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब पुलिस तंत्र के भीतर ही अधिकारी न्याय नहीं पा रहे, तो राज्य पुलिस पर भरोसा कैसे किया जाए?
दो मौतें, एक सवाल — सिस्टम में भरोसा कहाँ है?
आईपीएस वाई पूरन कुमार, जो अनुसूचित जाति से आते थे, ने कुछ दिन पहले आत्महत्या कर ली थी। उनकी मौत ने हरियाणा प्रशासन को झकझोर दिया था। परिवार ने आरोप लगाया कि उन्हें विभागीय और राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा। पूरन कुमार के निधन के बाद नौकरशाही में असंतोष की लहर दौड़ गई थी।
लेकिन यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि 14 अक्टूबर को रोहतक में साइबर सेल के एएसआई संदीप लाठर ने खुद को गोली मारकर सुसाइड कर लिया।
संदीप ने मरने से पहले वीडियो और सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर वाई पूरन कुमार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाए।
उन्होंने लिखा कि “पूरन कुमार ने मुझे झूठे मामलों में फंसाया और मानसिक रूप से परेशान किया।”
इस घटना ने पूरे प्रदेश में एक बार फिर उथल-पुथल मचा दी।
लाठर के परिवार ने शव का पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया और मांग रखी कि जब तक आईपीएस पूरन कुमार की पत्नी को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक अंतिम संस्कार नहीं होगा। परिवार के इस रुख से प्रशासनिक अफसरों की नींद उड़ गई। अब यह मामला सिर्फ एक सुसाइड केस नहीं, बल्कि हरियाणा की प्रशासनिक पारदर्शिता और विश्वास प्रणाली पर सवाल बन चुका है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या राज्य पुलिस अपने ही अफसरों के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर पाएगी?
राजनीति भी हुई सक्रिय
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी खुद रोहतक के लाढ़ौत गांव पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और सांत्वना प्रकट की। इसी दौरान विपक्षी नेताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा, अभय सिंह चौटाला और इनेलो नेता सुनैना चौटाला ने भी परिजनों से मुलाकात कर न्यायिक जांच की मांग की।
CBI या जज की निगरानी में जांच की मांग
परिवार, समाज और विपक्ष अब एक स्वर में कह रहे हैं कि जांच राज्य एजेंसी के बजाय CBI या हाईकोर्ट के सीटिंग जज की निगरानी में होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि राज्य पुलिस पर भरोसा अब नहीं रहा, क्योंकि दोनों ही घटनाओं में पुलिस विभाग से जुड़े अधिकारी खुद पीड़ित रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि CBI जांच तभी प्रभावी होती है जब राज्य सरकार की राजनीतिक इच्छा स्पष्ट हो।
वरना जांच वर्षों तक खिंच सकती है। वहीं, हाईकोर्ट जज की निगरानी से जनता को भरोसा तो मिलता है, लेकिन अदालतें सीधे जांच नहीं करतीं — केवल उसकी पारदर्शिता सुनिश्चित करती हैं।
भरोसे का संकट और जनता का सवाल
इन दोनों मौतों ने पुलिस विभाग में काम कर रहे अफसरों और कर्मचारियों के मन में डर पैदा कर दिया है। वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
सिस्टम के भीतर जातिगत और राजनीतिक समीकरणों की बातें भी खुलकर सामने आ रही हैं। जनता के बीच भी अब एक ही सवाल गूंज रहा है —
“अगर सिस्टम अपने ही अफसरों को इंसाफ नहीं दे सकता, तो आम नागरिक क्या उम्मीद करे?”
हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी में यह घटनाएं भरोसे के गहरे संकट की निशानी बन चुकी हैं।
अब निगाहें सरकार पर हैं — क्या वह निष्पक्ष जांच का आदेश देती है या राजनीतिक दबाव में यह मामला भी धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है?
फिलहाल परिवार का दर्द और जनता की मांग एक ही बात कहती है — इंसाफ तभी दिखेगा, जब जांच पारदर्शी और निष्पक्ष होगी।
----------------------------