अरावली को माफियाओं के हवाले नहीं होने देंगे, एक इंच भी बर्बाद नहीं होने देंगे: दीपेन्द्र हुड्डा
- 100 मीटर की नई परिभाषा से हरियाणा और NCR को भारी नुकसान, सरकार की नीयत पर सवाल
अरावली को माफियाओं के हवाले नहीं होने देंगे, एक इंच भी बर्बाद नहीं होने देंगे: दीपेन्द्र हुड्डा
- 100 मीटर की नई परिभाषा से हरियाणा और NCR को भारी नुकसान, सरकार की नीयत पर सवाल
टीएचटी न्यूज, रोहतक
अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर केंद्र सरकार के हालिया रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा है कि अरावली को खनन माफिया, रियल एस्टेट माफिया और बड़े धनाढ्य उद्योगपतियों के लालच की भेंट नहीं चढ़ने दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अरावली का एक इंच भी सरकार की बदनीयती से खराब नहीं होने देंगे और इस मुद्दे पर देशवासियों के साथ मिलकर संघर्ष किया जाएगा।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि अरावली भारतवर्ष की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है और यह केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत के लिए जीवनरेखा के समान है। उन्होंने सरकार द्वारा सौ मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली न मानने के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यह निर्णय किसी भी तरह से जनहित में नहीं है। यह नीति खनन माफिया के हित में बनाई गई प्रतीत होती है और आम जनता से इसका कोई सरोकार नहीं है।
उन्होंने कहा कि इस फैसले का सबसे ज्यादा नुकसान हरियाणा को होगा, क्योंकि राज्य में अरावली की अधिकांश पहाड़ियां सौ मीटर से कम ऊंचाई की हैं। इतना ही नहीं, यह ऊंचाई समुद्र तल से नहीं बल्कि निकटतम समतल भूमि से मापी जाएगी, जिससे लगभग पूरी अरावली इस फैसले की चपेट में आ जाएगी। आने वाले समय में शिवालिक की पहाड़ियां भी इससे प्रभावित हो सकती हैं, जो पंचकूला, अंबाला और यमुनानगर जैसे जिलों में स्थित हैं।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि जब हरियाणा, दिल्ली और NCR दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल हो चुके हैं, तब सरकार को अरावली क्षेत्र में अधिक वृक्षारोपण और संरक्षण की दिशा में कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन इसके विपरीत सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दे रही है कि सौ मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली ही न माना जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदूषण खत्म करने की बातें करने वाली सरकार वास्तव में प्रदूषण बढ़ाने का काम कर रही है।
उन्होंने रायसीना हिल का उदाहरण देते हुए कहा कि अरावली के अंतिम छोर के क्षरण और दिल्ली में जंगलों की समाप्ति का परिणाम आज राजधानी को भुगतना पड़ रहा है। यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो आने वाले समय में NCR में दमा और सांस से जुड़ी बीमारियों का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की।
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