बोहर में हथकरघा विरासत का उत्सव, स्वदेशी और रोजगार से जोड़ा आत्मनिर्भर भारत का संकल्प

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर रेजा परिधानों की प्रदर्शनी में पहुंचे सीएम ओएसडी वीरेंद्र बड़खालसा, बोले- पारंपरिक बुनाई को नई पीढ़ी से जोड़ना समय की जरूरत

 38
बोहर में हथकरघा विरासत का उत्सव, स्वदेशी और रोजगार से जोड़ा आत्मनिर्भर भारत का संकल्प

बोहर में हथकरघा विरासत का उत्सव, स्वदेशी और रोजगार से जोड़ा आत्मनिर्भर भारत का संकल्प

सब हेडिंग

- राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर रेजा परिधानों की प्रदर्शनी में पहुंचे सीएम ओएसडी वीरेंद्र बड़खालसा, बोले- पारंपरिक बुनाई को नई पीढ़ी से जोड़ना समय की जरूरत

ओपी वशिष्ठ, रोहतक :

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर बोहर गांव स्थित जुगल भवन में पारंपरिक हथकरघा, रेजा वस्त्र और ग्रामीण हस्तकला को समर्पित प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे मुख्यमंत्री के ओएसडी वीरेंद्र सिंह बड़खालसा ने कहा कि हथकरघा केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव है। पारंपरिक बुनाई और स्थानीय कौशल को संरक्षण देकर लाखों लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं।

यह प्रदर्शनी अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर ललिता चौधरी द्वारा केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हथकरघा) कार्यालय के सहयोग से बुनकर सेवा केंद्र, पानीपत की समर्थ योजना के तहत आयोजित की गई।

बड़खालसा ने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। ऐसे में इन कलाओं को नई तकनीक और आधुनिक बाजार से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इससे न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी, बल्कि ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलेगा।

उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार उद्यमिता और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य कर रही है। 28 अगस्त को गुरुग्राम में आयोजित होने वाले विशेष उद्यमिता कार्यक्रम में युवाओं को अपने नवाचार और व्यापारिक विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। साथ ही किसानों को कपास की खेती के लिए प्रोत्साहित कर वस्त्र उद्योग की पूरी श्रृंखला को मजबूत बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।

मुख्य अतिथि ने प्रदर्शनी के दौरान पारंपरिक लूप बुनाई का प्रशिक्षण लिया तथा चरखे पर रेजा की कताई कर बुनकरों के कौशल को करीब से समझा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रेशों से बने वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी होते हैं क्योंकि इनमें वायु संचार बेहतर होता है और इनमें प्राकृतिक एंटी-माइक्रोबियल गुण भी पाए जाते हैं।

उन्होंने आयोजन की संयोजक ललिता चौधरी तथा पार्षद मनीषा सुमित नांदल के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन स्थानीय बुनकरों, कारीगरों और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रदर्शनी में अंशु और राहुल नांदल द्वारा पुरानी घरेलू एवं पारंपरिक वस्तुओं की दुर्लभ प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। बड़खालसा ने इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की सराहनीय पहल बताया। 

कार्यक्रम में हरियाणवी कलाकार पद्मश्री महावीर गुड्डू, पूर्व प्रधान राज सिंह नांदल, खुशीराम हुड्डा, संदीप दांगी, सुखदेव नांदल, संचित नांदल, रविंद्र उर्फ बिल्लू नांदल, सुमित नांदल तथा अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: विरासत और स्वदेशी का प्रतीक

हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है।

1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में इसकी शुरुआत हुई।

वर्ष 2015 से भारत सरकार इसे राष्ट्रीय स्तर पर मना रही है।

उद्देश्य: हथकरघा उद्योग, बुनकरों और पारंपरिक वस्त्रों को बढ़ावा देना।

हथकरघा उद्योग एक नजर में

35 लाख से अधिक लोगों की आजीविका का आधार।

70% से अधिक कार्यबल में महिलाएं।

पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ उत्पादन प्रणाली।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वदेशी उद्योग की मजबूत कड़ी।

-------------