मिट्टी बची तो भविष्य बचेगा: जलवायु परिवर्तन और केमिकल खेती से हरियाणा की धरती पर बढ़ता संकट
-The Haryana Talks के विशेष एपिसोड में डॉ. नीना सहवाग ने बताए मिट्टी और खेती को बचाने के उपाय
मिट्टी बची तो भविष्य बचेगा: जलवायु परिवर्तन और केमिकल खेती से हरियाणा की धरती पर बढ़ता संकट
-The Haryana Talks के विशेष एपिसोड में डॉ. नीना सहवाग ने बताए मिट्टी और खेती को बचाने के उपाय
ओपी वशिष्ठ, रोहतक :
हरियाणा की खेती आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उत्पादन बढ़ाने की दौड़ ने मिट्टी की सेहत को गंभीर खतरे में डाल दिया है। एक तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, तो दूसरी तरफ यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल ने जमीन की उर्वरता को कमजोर कर दिया है। बेमौसम बारिश, लंबे सूखे, बढ़ता तापमान और घटती जैविक क्षमता अब किसानों के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
इन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों पर The Haryana Talks प्रतिनिधि से कृषि एवं किसान वेलफेयर विभाग, रोहतक की डिविजनल सॉयल कंजर्वेशन ऑफिसर डॉ. नीना सहवाग से विस्तार से बातचीत की। इस चर्चा में मिट्टी की बिगड़ती हालत, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और टिकाऊ खेती की जरूरत पर गंभीर चिंतन किया गया।
डॉ. नीना सहवाग ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह सीधे किसानों की आय, मिट्टी की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। उन्होंने बताया कि हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मौसम में असामान्य बदलाव देखने को मिले हैं। कभी अचानक तेज बारिश होती है तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा असर मिट्टी की संरचना और फसलों की उत्पादकता पर पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि बेमौसम बारिश खेतों की ऊपरी उपजाऊ परत को बहा ले जाती है, जिसे टॉप सॉयल कहा जाता है। यह परत पौधों के लिए सबसे ज्यादा पोषक तत्वों से भरपूर होती है। जब यह मिट्टी बह जाती है तो खेतों की उत्पादक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसके अलावा अत्यधिक तापमान मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को भी प्रभावित करता है, जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. सहवाग ने चिंता जताई कि अधिक उत्पादन की होड़ में किसान रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरक तत्काल फसल उत्पादन बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन लंबे समय तक इनके अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता कमजोर हो जाती है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा घटती है और उसकी जल धारण क्षमता भी कम होने लगती है।
उन्होंने बताया कि लगातार रासायनिक खेती करने से मिट्टी “थक” जाती है। ऐसी मिट्टी में धीरे-धीरे पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ने लगता है, जिससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। इसके साथ ही कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
बातचीत के दौरान डॉ. नीना सहवाग ने sustainable farming यानी टिकाऊ खेती को समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया। उन्होंने किसानों को फसल चक्र अपनाने, जैविक खाद के उपयोग और पानी के संतुलित इस्तेमाल पर जोर देने की सलाह दी। उनका कहना था कि यदि किसान केवल गेहूं और धान पर निर्भर रहेंगे तो मिट्टी पर दबाव लगातार बढ़ता जाएगा। इसके बजाय दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों को अपनाना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को मिट्टी की नियमित जांच करवानी चाहिए ताकि उन्हें यह पता चल सके कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी है। Soil Health Card जैसी योजनाएं किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती हैं। इसके अलावा खेतों में पराली जलाने की बजाय उसे जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है।
इस चर्चा में यह भी सामने आया कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला केवल सरकार या वैज्ञानिकों के भरोसे नहीं किया जा सकता। इसके लिए आम नागरिकों और किसानों दोनों को अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा। पानी की बचत, रासायनिक उत्पादों का सीमित उपयोग और पर्यावरण के प्रति जागरूकता आने वाले समय में बेहद जरूरी होगी।
उन्होंने इस बातचीत के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया कि मिट्टी केवल खेती का आधार नहीं, बल्कि मानव जीवन का मूल स्रोत है। यदि मिट्टी की सेहत लगातार बिगड़ती रही तो आने वाले समय में खाद्य संकट और पर्यावरणीय समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
यह एपिसोड किसानों, छात्रों, शोधकर्ताओं और आम नागरिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें खेती और पर्यावरण से जुड़े उन सवालों को उठाया गया है, जिनका असर सीधे समाज और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से टिकाऊ खेती और मिट्टी संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में खेती की लागत बढ़ेगी और उत्पादन क्षमता घटती जाएगी। इसलिए समय की मांग है कि किसान आधुनिक तकनीक के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को भी प्राथमिकता दें।
मिट्टी को बचाने की यह लड़ाई केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। क्योंकि मिट्टी बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।
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