सर्किट से आगे: इलेक्ट्रॉनिक्स-चालित भविष्य के लिए समाज को तैयार करना

दुनिया में बदलता युद्धक्षेत्र

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सर्किट से आगे: इलेक्ट्रॉनिक्स-चालित भविष्य के लिए समाज को तैयार करना

सर्किट से आगे: इलेक्ट्रॉनिक्स-चालित भविष्य के लिए समाज को तैयार करना

- दुनिया में बदलता युद्धक्षेत्र

टीएचटी न्यूज, रोहतक :

बदलता युद्धक्षेत्र

बीते कुछ वर्षों में युद्ध की परिभाषा पलट गई है। अब निर्णायक मोर्चे तलवार या बंदूक नहीं, बल्कि चिप, सेंस़र और साइबर-कोड हैं। इज़राइल का पेजर-ट्रिगर हमला, यूक्रेन का रूसी ठिकानों पर ड्रोन प्रहार और भारत का हाल का “ऑपरेशन सिंदूर”—ये सब दिखाते हैं कि बटन दबते ही हज़ारों किलोमीटर दूर लक्ष्य तबाह हो सकता है। तेज़ डेटा प्रोसेसिंग, सुरक्षित संचार और स्वचालित निर्णय-प्रणालियाँ आज की असली “ताक़त” हैं।

हमारे रोज़मर्रा में छिपे चिप

सुबह स्मार्टफ़ोन का अलार्म बजाता है, रसोई में इंडक्शन चूल्हा तापमान खुद तय करता है और रात को हम बिना नक़दी डिजिटल भुगतान कर लेते हैं। घर के एसी, गाड़ी के ब्रेक, खेत में खाद छिड़कता ड्रोन—सबकी नस-नस में माइक्रो-चिप दौड़ रही है। कोविड के दौर में ऑनलाइन कक्षाएँ और दफ़्तर सिर्फ़ इसी इलेक्ट्रॉनिक रीढ़ पर टिके रहे। साफ़ है, इलेक्ट्रॉनिक्स अब विलासिता नहीं, जीवन का आधार हैं।

क्यों बनें ‘इलेक्ट्रॉनिक साक्षर’

साइबर-हमले, फेक-न्यूज़ या बिजली-पानी के डिजिटल नेटवर्क पर गड़बड़ी—इनसे निपटने के लिए हर नागरिक को बुनियादी समझ चाहिए कि तकनीक कैसे चलती है। यह महज़ इंजीनियरों का काम नहीं; जिस तरह हर घर वाला बिजली-मीटर पढ़ना जानता है, उसी तरह बेसिक इलेक्ट्रॉनिक समझ भी रोज़मर्रा की ज़रूरत बनती जा रही है।

भारत की पाँच बड़ी पहलें

सरकार ने सेमीकंडक्टर, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक और कौशल विकास पर मिशन मोड में काम शुरू किया है। लक्ष्य साफ़ है—चिप से लेकर ड्रोन तक “मेड इन इंडिया” बनाना, रोज़गार बढ़ाना और रक्षा-सुरक्षा में आत्मनिर्भर होना। उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले पाँच-छह साल में देश का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन पाँच सौ अरब डॉलर के पार जा सकता है।

हरियाणा भी दौड़ में आगे

राज्य ने ईएसडीएम नीति (इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन एवं मैन्युफ़ैक्चरिंग) और नया “भविष्य विभाग” बनाया है। सोनीपत से शुरू हुए “द्रोणागिरी” प्रोजेक्ट से भू-स्थानिक डेटा तैयार हो रहा है, जो खेती-सड़क जैसी योजनाओं की नींव बनेगा। विश्वविद्यालयों में इनक्यूबेशन सेंटर, ड्रोन लैब और छात्र-स्टार्ट-अप्स को दस-दस लाख रुपये तक की सीड-फ़ंडिंग दी जा रही है।

चुनौती: घटती पढ़ाई, बढ़ती माँग

सरकारी सर्वे बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मेकेनिकल जैसी कोर ब्रांचों में दाख़िले घट रहे हैं; उधर उद्योग को हर साल हज़ारों चिप-डिज़ाइनर और हार्डवेयर इंजीनियर चाहिए। कारण साफ़ हैं—छात्रों को लगता है कि नौकरी का तुरत चांस आईटी या कोडिंग में ज़्यादा है, जबकि असल में AI, 5G और ड्रोन की जड़ वही “कोर” शाखाएँ हैं।

रास्ता क्या है?

पहला, कॉलेज-स्कूल में “टिंकर लैब” खुलें जहां बच्चे खुद सर्किट जोड़-तोड़ कर देखें। दूसरा, DRDO-ISRO जैसी एजेंसियाँ फ़ाइनल-ईयर प्रोजेक्ट सीधे छात्रों को दें ताकि पढ़ाई और उद्योग की खाई पटे। तीसरा, पाठ्यक्रम में इलेक्ट्रॉनिक्स को AI, डेटा साइंस और डिज़ाइन थिंकिंग के साथ जोड़ा जाए, जिससे डिग्री पूरी होते-होते युवा “भविष्य-तैयार” हों।

हमारे समय का सच यह है कि सीमा पर तैनात ड्रोन से लेकर रसोई के स्मार्ट-मिक्सर तक, सब कुछ सर्किट से चलता है। “सर्किट से आगे” का संदेश सीधा है—तकनीक को केवल उपभोग न करें, उसे समझें, सवाल पूछें और अपने हिसाब से ढालें। जब किसान, छात्र और उद्यमी सभी ऐसा करेंगे, तभी आत्मनिर्भर भारत की नींव पुख़्ता होगी और हरियाणा सहित पूरा देश इस इलेक्ट्रॉनिक युग में अग्रणी बन पाएगा।

डा. वेद प्रकाश

सहायक प्राध्यापक, एमिटी यूनिवर्सिटी

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