JJP की जींद रैली बनाम INLD की रोहतक रैली : मंच पर दिखा कुनबा

- ओपी चौटाला के निधन के बाद दोनों दलों के पहले बड़े राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन में क्या था संदेश?**

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JJP की जींद रैली बनाम INLD की रोहतक रैली : मंच पर दिखा कुनबा

JJP की जींद रैली बनाम INLD की रोहतक रैली

- ओपी चौटाला के निधन के बाद दोनों दलों के पहले बड़े राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन में क्या था संदेश?**

ओपी वशिष्ठ, रोहतक :

हरियाणा की सियासत में चौटाला परिवार एक बार फिर चर्चा और विश्लेषण के केंद्र में है। जननायक जनता पार्टी (JJP) और इंडियन नेशनल लोकदल (INLD)—दोनों दलों ने, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के निधन के बाद अपनी-अपनी पहली बड़ी रैलियां आयोजित कीं। स्वाभाविक तौर पर इन रैलियों की तुलना होने लगी है—क्योंकि दोनों का राजनीतिक आधार एक ही परिवार और एक ही वोट-बैंक के इर्द-गिर्द घूमता है।

सात दिसंबर 2025 को जुलाना (जींद) में हुई JJP की स्थापना दिवस रैली और 25 सितंबर 2025 को रोहतक में आयोजित INLD की सम्मान दिवस रैली को हरियाणा की भावी राजनीति का ‘टेस्ट मैच’ माना जा रहा है। इन दोनों आयोजनों में न केवल भीड़, मंच और व्यवस्थाओं की तुलना हो रही है, बल्कि राजनीतिक संदेशों, नेतृत्व की दिशा और चौटाला परिवार की भावी रणनीति पर भी निगाहें टिक गई हैं।

दुष्यंत और अभय का अलग-अलग राजनीतिक संदेश

इन दोनों रैलियों में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर रही कि JJP नेता और पूर्व डिप्टी मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने अपने संबोधन में अपने दादा ओपी चौटाला का नाम एक बार भी नहीं लिया। हालांकि मंच पर बड़े होर्डिंग्स पर उनका फोटो मौजूद था, लेकिन दुष्यंत ने नाम लेना टाल दिया।

यह तब और महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जब INLD के वरिष्ठ नेता अभय चौटाला ने कुछ दिन पहले ही सार्वजनिक रूप से जजपा को चेतावनी दी थी कि ओपी चौटाला का नाम और फोटो बिना अनुमति के इस्तेमाल न करें।

वहीं, रोहतक की रैली में INLD और अभय चौटाला ने मंच से ताऊ देवीलाल और ओपी चौटाला दोनों का कई बार उल्लेख किया। इससे INLD ने यह संदेश देने की कोशिश की कि असली राजनीतिक विरासत वही संभाल रही है, जबकि JJP की चुप्पी को सियासी दूरी के रूप में देखा गया।

दोनों रैलियों में क्या था समान?

दिलचस्प बात यह है कि दोनों रैलियों के मंच, भीड़ प्रबंधन और तैयारियों में कई चीजें एक जैसी नजर आईं:

डबल मंच और LED स्क्रीन:

INLD और JJP दोनों ने दो स्तर का मंच बनाया। एक मंच मुख्य नेताओं के लिए था, जबकि दूसरे पर जिला और ब्लॉक स्तरीय कार्यकर्ता मौजूद रहे। साथ ही दोनों रैलियों में बड़ी LED स्क्रीन लगाई गईं ताकि दूर बैठे समर्थक भी संबोधन साफ सुन सकें।

महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था:

दोनों दलों ने महिलाओं के लिए अलग बैठने की जगह तय की। खास बात यह रही कि दोनों रैलियों में बड़ी संख्या में महिलाएं हरी चुनरी पहनकर पहुंचीं, यह परंपरा दोनों दलों में लंबे समय से चली आ रही है।

देवीलाल और चौटाला की तस्वीरें:

दोनों आयोजनों में ताऊ देवीलाल और ओपी चौटाला की तस्वीरें बैनरों पर प्रमुखता से लगीं। दोनों पार्टियां खुद को ताऊ देवीलाल की असली राजनीतिक विरासत बताने में जुटी दिखीं।

भीड़ जुटाने का दावा:

INLD और JJP दोनों की ओर से एक-दूसरे से ज्यादा भीड़ होने के दावे किए गए। INLD की रैली में कुर्सियां नहीं लगाई गई थीं, जबकि JJP ने कुर्सियां लगाईं। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना कुर्सियों वाली रैली में भीड़ ज्यादा दिखाई देती है।

पुराने बड़े नेता नदारद रहे

ओपी चौटाला के निधन के बाद आयोजित इन दोनों रैलियों में राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता कम दिखाई दिए।

INLD की रैली में पंजाब के पूर्व डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल, तेलंगाना की पूर्व सांसद कविता और जम्मू-कश्मीर के डिप्टी सीएम सुकेश शामिल हुए।

JJP की रैली में पार्टी संरक्षक अजय चौटाला प्रमुख चेहरा रहे, लेकिन पूर्व मंत्री रणजीत सिंह चौटाला रैली में शामिल नहीं हुए, जबकि उन्हें न्योता भेजा गया था।

यह स्थिति कुछ साल पहले की तुलना में काफी अलग है, जब देवीलाल जयंती पर आयोजित INLD रैलियों में नीतिश कुमार, फारूक अब्दुल्ला, प्रकाश सिंह बादल जैसे बड़े नेता शिरकत करते थे।

2018 की टूट और चौटाला परिवार का बिखराव

दोनों रैलियों का विश्लेषण 2018 की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बिना अधूरा है।

अक्तूबर 2018 की गोहाना रैली में दुष्यंत के समर्थन में लगे नारों के बाद ओपी चौटाला ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर अजय चौटाला, दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को INLD से बाहर कर दिया।

इसके बाद अजय चौटाला ने JJP का गठन किया।

अब 2025 में, ओपी चौटाला के निधन के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है—क्या दोनों भाइयों (अजय और अभय) के बीच राजनीतिक दूरी और बढ़ेगी या कम होगी?

राजनीतिक संकेत और 2029 की तैयारी

दोनों रैलियां इस बात का संकेत हैं कि INLD और JJP दोनों हरियाणा की राजनीति में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटे हैं।

एक ओर INLD खुद को चौटाला विरासत का ‘असली वारिस’ साबित करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर JJP युवा नेतृत्व और विकास की राजनीति का दावा कर रही है।

हालांकि दोनों पार्टियों की रैलियों में भीड़ मौजूद रही, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य की वास्तविक तस्वीर 2029 के विधानसभा चुनावी समीकरण ही तय करेंगे। फिलहाल इतना साफ है कि ओपी चौटाला के जाने के बाद चौटाला परिवार की राजनीति में नई खींचतान, नए संदेश और नई दूरी साफ दिखाई दे रही है।

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