जब सिस्टम से बाहर जाकर बना रास्ता: रोहतक का मयंक चौधरी अब T20 वर्ल्ड कप में UAE की जर्सी में
पिता की मौत, रणजी से निराशा और दुबई की गलियों से वर्ल्ड कप तक—हरियाणा के युवा की अलग कहानी
जब सिस्टम से बाहर जाकर बना रास्ता: रोहतक का मयंक चौधरी अब T20 वर्ल्ड कप में UAE की जर्सी में
- पिता की मौत, रणजी से निराशा और दुबई की गलियों से वर्ल्ड कप तक—हरियाणा के युवा की अलग कहानी
ओपी वशिष्ठ, रोहतक ।
हरियाणा के रोहतक जिले के एक छोटे से गांव घिलौड़ कलां से निकली यह कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि हौसले, धैर्य और वैकल्पिक रास्ते की पहचान की कहानी है। मयंक कुमार चौधरी—जिसे भारत में मौका नहीं मिला—अब भारत में ही होने वाले T20 वर्ल्ड कप 2026 में यूएई की अंतरराष्ट्रीय टीम की ओर से खेलते नजर आएंगे।
5 फरवरी 1997 को जन्मे मयंक की जिंदगी आसान नहीं रही। महज 5 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया। मां राजेश देवी ने सरकारी नौकरी के सहारे परिवार संभाला और बच्चों को चंडीगढ़ ले आईं। वहीं से मयंक का क्रिकेट सफर शुरू हुआ—बिना किसी बड़े नाम, बिना किसी सिफारिश के।
मयंक ने 10 साल की उम्र में क्रिकेट थामा। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर लगातार खेलते रहे। अंडर-14 से लेकर अंडर-23 तक नेशनल टूर्नामेंट खेले, हरियाणा क्रिकेट एसोसिएशन की सीनियर प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया। दो बार हरियाणा रणजी टीम के कैंप तक पहुंचे—2017 और 2018—लेकिन अंतिम टीम में जगह नहीं मिल सकी।
यहीं से मयंक की कहानी आम खिलाड़ियों से अलग हो जाती है। जहां अधिकतर युवा यहीं हार मान लेते हैं, वहीं मयंक ने परिवार से थोड़ा वक्त मांगा और 2021 में दुबई का रुख किया। वहां क्लब क्रिकेट खेला, दुबई डेयरडेविल्स जैसी टीमों के लिए लगातार प्रदर्शन किया और खुद को साबित किया।
दुबई में मिले मौके ने उनकी मेहनत को पहचान दी। एशिया कप में यूएई टीम के लिए दो बार खेलना, डीपीएल में अबू धाबी नाइट राइडर्स से चयन और लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन—इन सबने मयंक को यूएई की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बना दिया।
खास बात यह है कि मयंक ने क्रिकेट की बारीकियां युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह से सीखीं। तकनीक के साथ-साथ मानसिक मजबूती—यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बनी। आज वही खिलाड़ी 10 फरवरी को चेन्नई में न्यूजीलैंड के खिलाफ वर्ल्ड कप मैच खेलते नजर आएंगे।
मयंक चौधरी की यह सफलता हरियाणा के उन हजारों युवाओं के लिए संदेश है, जो सिस्टम से बाहर होकर भी सपने देख रहे हैं। यह कहानी बताती है कि रास्ते बंद हों तो देश बदल सकता है, लेकिन सपना नहीं।
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